अफजलखान वध

शिवाजी महाराजांनी १६५८ साली स्वराज्याची अधिकृत घोषणा केल्यानंतर त्यांना पहिल्या ज्या मोठ्या संकटाला सामोरे जावे लागले ते संकट म्हणजे अफजलखान. 

तरी सगळ्या संकटांवर मात करून छत्रपती शिवाजी महाराजांनी आजच्याच दिवशी म्हणजे १० नोव्हेंबर १६५९ रोजी प्रतापगडाच्या पायथ्याशी अफजलखानाला ठार मारले. 


"एकाशीत्याधिकै: पंच दशभिः संमितैः शतैः ।

शालिवाहे शके संवत्सरे चैव विकारिणि ।।

मासि मार्गे शिते पक्षे सप्तम्यां गुरुवासरे ।

माध्यान्हे दैवतद्वेषी शिवेनाफजलो हतः ।।"

- शके १५८१ विकारी नाम संवात्सरे, मार्गशीर्ष महिन्यात, शुक्ल पक्षे, सप्तमी तिथीस, गुरुवारी दुपारी देवद्वेष्टा अफजखानाला शिवाजी ने ठार मारले. 

- शिवभारत. 

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"हे देखोन राजियांनी डावे हाताचे वाघनख होते तो हात पोटात चालवला. खानाने आंगात झगाच घातला होता. वाघनखाचा मारा करिताच खानाची चरबी बाहेर आली."

- सभासद बखर

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"शिवाजीने आपल्या हृदयाजवळ लपवून ठेवलेला खंजीर काढून अफजलखानाच्या छातीत खुपसला."

- हेन्री रेविंगटन चे कंपनी ला पत्र.

 (English Records on Shivaji, शिवकालीन पत्रासार संग्रह)

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"महाराजांनी आपले शरीर किंचित आकसून घेऊन तो प्रहार चुकविला. त्यानंतर त्यांनी आपला खंजीर अफजलखानाच्या पोटात खोलवर खुपसला."

 - छत्रपती शिवाजी- सेतूमाधवराव पगडी. 

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"परंतु पलभरमें बुद्धी को ठिकाने लाकर, बायाँ हाथ जोरसे घुमाकर उन्होनें अफजल खाँके पेटमें 'बघनखा' घुसेड दिया."

- शिवाजी - जदुनाथ सरकार.

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- ओंकार ताम्हनकर.

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